केदारनाथ आपदा के चार साल बाद भी अधूरे इंतजाम, भगवान जाने कब पूरे होंगे ये काम

0
1055
केदारनाथ आपदा के चार साल बाद भी अधूरे इंतजाम, भगवान जाने कब पूरे होंगे ये काम

मौसम विभाग ने इस साल मानसून सीजन में सामान्य से ज्यादा बारिश का अनुमान लगाया है। बरसात के मौसम में दुर्भाग्य से अगर उत्तराखंड में कोई आपदा आई तो उससे निपटना मुश्किल हो जाएगा।

दरअसल, जून 2013 की केदारनाथ आपदा से राज्य में शासन व्यवस्था ने राहत और बचाव का पाठ तो पढ़ा, लेकिन आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने और इन आपदाओं के पूर्वानुमान की ओर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया। सरकारी मशीनरी अपने स्तर पर चुस्त-दुरुस्त होने का दावा भले ही कर रही हो, लेकिन आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों की ही इस व्यवस्था में भागीदारी पहले भी न के बराबर थी और अब भी हालात नहीं सुधरे हैं।

यह भी पढ़े : जानियें उन 10 म‌ंद‌िरों के बारे में जहां पांडवों ने गुजारे थे खास पल

जून 2013 की केदारनाथ आपदा की एक वजह मौसम में बदलाव को भी माना गया। आपदा के तीन साल बाद अब यह संकट और गहराया है। ऐसे में भूकंप से लेकर नदियों में अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन के खतरे बढ़े ही हैं। इतना होने पर राज्य का आपदा प्रबंधन तंत्र परंपरागत लीक पर चलने को ही उपलब्धि मान रहा है।

हाल यह है कि राज्य की सारी तैयारी आपदा के बाद राहत और बचाव पर केंद्रित है। आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने और आपदा का पूर्वानुमान लगाने का तंत्र प्रदेश में अभी तक विकसित नहीं हो पाया है। हाल यह है कि 64 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन में से केवल चार ही स्थापित हो पाए हैं। डाप्लर रडार के जरिए मौसम की सटीक भविष्यवाणी भी हकीकत में नहीं बदल पाई।

केदारनाथ आपदा के चार साल बाद भी अधूरे इंतजाम, भगवान जाने कब पूरे होंगे ये काम
केदारनाथ आपदा के चार साल बाद भी अधूरे इंतजाम, भगवान जाने कब पूरे होंगे ये काम

सबसे चिंताजनक बात यह है कि आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतिगत फैसलों के लिए जरूरी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी पूरी तरह से सक्रिय नहीं है। मार्च में इसकी बैठक का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन सियासी संकट के चलते प्राधिकरण की बैठक अभी तक नहीं हो पाई।

यह भी पढ़े : 400 साल पुराने मंदिर का रहस्य

ऐसे में नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रह रही आबादी को हटाने, अति संवेदनशील 400 से अधिक गांवों के पुनर्वास का मामला भी अधर में है। राज्य में भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील क्षेत्रों में भूकंपरोधी मकान, स्कूल, अस्पताल बनाने का काम भी न के बराबर ही है। राज्य की आपदा प्रबंधन योजना तैयार की जा चुकी है पर इस योजना को अभी गांवों तक नहीं पहुंचाया जा सका है। ऐसे में आपदा से सीधे प्रभावित होने वाला वर्ग ही इस तैयारी से पूरी तरह अछूता है।

जून 2006 में डॉ. बीआर अरोड़ा की अध्यक्षता में ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए समिति का गठन किया गया था। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में गंगा बेसिन पर 917, यमुना बेसिन में 50, भागीरथी बेसिन में 277, अलकनंदा बेसिन में 326 और कालीगंगा में 264 ग्लेशियर हैं।

प्रदेश में करीब 75 वर्ग किलोमीटर की 127 ग्लेशियर झीलें हैं। समिति ने ग्लेशियर झीलों के प्रभावित क्षेत्रों में पर्यटकों की आवाजाही सीमित करने, ग्लेशियर झीलों की इनवेंटरी बनाने, मौसम पर आटोमेटिक वेटर स्टेशन के नेटवर्क के जरिए नजर रखने आदि की संस्तुति की थी।

छह पर्वतीय जिलों में 30 अप्रैल को मॉक ड्रिल
भूकंप के लिहाज से हो रही तैयारी को परखने के लिए 30 अप्रैल को प्रदेश के छह पर्वतीय जिलों में मॉक ड्रिल प्रस्तावित है। इसके तहत यह देखा जाएगा कि भूकंप आने पर सरकारी मशीनरी कितने समन्वय से काम करती है और राहत और बचाव के काम को कितनी तेजी से अंजाम दिया जाता है। इससे पहले रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और चमोली में मॉक ड्रिल की गई थी।

2013 के बाद हुए काम
राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की तीन कंपनियां स्थापित, दो कंपनियों को किया जा रहा है तैयार। एसडीआरएफ को नए उपकरण खरीदने के लिए आठ करोड़ रुपये का बजट भी किया गया जारी।

यह भी पढ़ें : ताजमहल से 1100 साल पुरानी है प्यार की ये निशानी!

जून, 2013 की आपदा के बाद राज्य में चार धाम यात्रा के तहत आने वाले यात्रियों के पंजीकरण की भी व्यवस्था, इससे पहले यात्रियों की संख्या का कोई हिसाब नहीं रखा जाता था। इसके लिए बायोमैट्रिक पंजीकरण भी शुरू किया गया।

रुद्रप्रयाग, चमोली और पिथौरागढ़ में आपदा से पहले भी जिला स्तरीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित था। आपदा के बाद इन जिलों में योजना प्रबंधन इकाइयों (पीआइयू) का गठन भी किया गया। पीआईयू को पांच करोड़ रुपये तक के काम अपने स्तर से कराने की छूट दी गई।

जून, 2013 की आपदा में सबसे अधिक प्रभावित यातायात व्यवस्था हुई थी। सड़कें जगह-जगह टूट गई थीं और हवाई सेवा न के बराबर थी। इसको देखते हुए 52 नए हैलीपैड बनाने की तैयारी शुरू की गई। इसमें से नौ बनकर तैयार भी हो गए हैं।

केदारनाथ आपदा में एक बड़ी समस्या संचार व्यवस्था के ठप्प हो जाने की भी रही। इस समस्या से निपटने के लिए 22 नए सेटेलाइट फोन लिए जा रहे हैं। राज्य में इस समय 13 सेटेलाइट फोन हैं।

राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ ) की एक कंपनी झाझरा में स्थापित। पहले इस कंपनी को हरिद्वार में स्थापित किया जा रहा था। करीब 45 कर्मी इस समय झाझरा में तैनात भी हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के साथ आपदा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण के लिए करार।

नदियों की स्थिति, बाढ़ क्षेत्र आदि के मापन के लिए भी योजना तैयार।

जो काम नहीं हुए

जून 2013 की आपदा से पहले राज्य में आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च संस्था राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और सलाहकार समिति सक्रिय नहीं थी। 2013 के बाद प्राधिकरण के सचिवालय को स्थापित करने के लिए काम शुरू किया गया, लेकिन अभी तक यह काम पूरा नहीं हो पाया। मार्च, 2016 में प्राधिकरण की बैठक का प्रस्ताव भी तैयार किया गया था। सरकार गिर जाने के बाद यह मामला अधर में है। ऐसे में प्रदेश में आपदा प्रबंधन की नीतियों से संबंधित फैसले लेने का काम अधर में है।

जून 2013 की आपदा से पहले राज्य में करीब 321 गांव पुनर्वास की बाट जोह रहे थे। हर बार आपदा के बाद इस तरह के गांवों की संख्या में इजाफा हो जाता है। अब राज्य में करीब 400 गांव पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। एक भी गांव का अभी तक प्रदेश में पुनर्वास नहीं हुआ।

ग्लेशियर टूटने के कारण नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ की पूर्व जानकारी के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत 2013 में महसूस की गई। इसमें सिर्फ इतना ही काम हुआ कि चार स्थानों पर ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन लग पाए हैं। राज्य में 64 स्थानों पर इस तरह के स्टेशन स्थापित किए जाने है। मौसम के सटीक पूर्वानुमान के लिए दो स्थानों पर डॉप्लर रडार स्थापित करने का काम भी अधर में है।

जून 2013 की आपदा से यह भी सामने आया था कि आपदा प्रबंधन में प्रभावित लोगों की अधिक से अधिक भागीदारी होनी चाहिए। इसके लिए गांव के स्तर पर आपदा प्रबंधन योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने का लक्ष्य रखा गया था। यह काम पूरा नहीं हो पाया। आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र इतना जरूर कर पाया है कि प्रदेश में आपदा के समय राहत और बचाव की 11 हजार लोगों की टीम खड़ी कर चुका है।

2013 की आपदा के बाद नदियों के बहाव क्षेत्र से बसावटों को हटाने और भूकंप रोधी मकानों के बनाने पर जोर दिया गया था। यह काम अधर में है।

क्या है चुनौती
प्रदेश में भूस्खलन, भारी बरसात या फिर बादल फटने से नदियों में अचानक बाढ़, भूकंप आदि की आपदा से निपटने की चुनौती है। 2010-11 में भारी बरसात होने के कारण प्रदेश में करीब 23 पुलों और 14 हजार किलोमीटर सड़क को नुकसान पहुंचा था। उस समय सारा पहाड़ थम कर रह गया था। इस बार भी अधिक बरसात की संभावना जताई जा रही है। साथ ही चार धाम यात्रा में भी इस बार बड़ी संख्या में यात्रियों के आने की संभावना है। इस दोहरी चुनौती से शासन को निपटना होगा।

2015 की कैग रिपोर्ट ने भी उठाये थे कई सवाल
जून 2013 की प्राकृतिक आपदा के बाद 2015 में गैरसैंण सत्र के दौरान सदन के पटल पर रखी गई कैग की रिपोर्ट ने भी आपदा प्रबंधन परकई सवाल खड़े किये थे। इस परफार्मेंस रिपोर्ट में कैग का साफ कहना था कि हिमनदियों पर गठित विशेषज्ञ समिति की संस्तुतियों को लागू न करना भी प्राकृतिक आपदा की त्रासदी को बढ़ाने वाला साबित हुआ था।

कैग का कहना था कि निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाले मलबे को नदियों में डंप किया जा रहा है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण लगभग अक्रियाशील था। सरकार निर्धारित समय सीमा के भीतर बिजली, पानी और सड़क संपर्क को रिस्टोर कर पाने में सक्षम नहीं थी। खतरों को भांपते हुए आपदा प्रबंधन रणनीति बनाने और ऐसे खतरों से प्रभावी रूप में निपटने के लिए योजना बनाने में सक्षम नहीं था।

कैग ने मॉनिटरिंग की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया था। रिपोर्ट के आने के एक साल बाद भी इन सवालों के उत्तर सामने नहीं आ पाए हैं। हिमनदियों पर गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट अब भी धूल फांक रही है। निर्माण कार्य में मलबे को नदियों में डंप करने की व्यवस्था अब भी जारी है। कैग ने आपदा के लिए जलवायु परिवर्तन का एक कारण माना है। हाल यह है कि अभी प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने पर काम नहीं हो पाया है।

मोबाइल ऐप हो रहा है तैयार
शासन के स्तर पर राहत इतनी जरूर है कि चार धाम यात्रियों को पंजीकरण की सुविधा देने, चार धाम से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए मोबाइल ऐप तैयार किया जा रहा है। इसकी लॉचिंग 30 अप्रैल तक हो जाने की उम्मीद जताई जा रही है। केदारनाथ से रुद्रप्रयाग के बीच ई-व्यवस्था को भी तैयार किया गया है।

इन ← → पर क्लिक करें

Loading...
loading...