क्या है १०८ बार मन्त्र जाप का रहस्य…!!

क्या आपने कभी सोचा है कि हम जो मंत्र जाप करते हैं या गुरु द्वारा मंत्र प्रदान किये जाते हैं पर यह आदेश दिया जाता है कि इस मंत्र का नियम से नित्य 108 जाप करना है, तो इस 108 संख्या का हमारे मंत्र जाप से क्या संबंध है? यह संख्या पूरी 100 क्यों नहीं बतायी जाती? यह कोई और संख्या भी तो हो सकती है।

इस गूढ़ रहस्य का भेदन करने पर जो परिणाम अध्ययन, मनन व चिंतन द्वारा प्राप्त हुआ, वह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं। हमें अपने प्राचीन ऋषियों के चिंतन व अगाध-ज्ञान पर श्रध्दा से नतमस्तक होना पड़ता है।
इस जगत में हम जो कुछ देखते हैं, उन सबमें पृथ्वी जल, अग्नि, वायु और आकाश- ये पंच तत्व हैं जिनकी उत्पत्ति का स्रोत आकाश है- आकाश से वायु, वायु से अग्नि, आग्न से जल, जल से पृथ्वी की उत्पति हुई। पृथ्वी का गुण, गंध, जल का रस, अग्नि का तेज, वायु का स्पर्श और आकाश का शब्द है। इस प्रकार संसार के सभी पदार्थों का मूल गुण शब्द है, इसी प्रकार ‘शब्द ब्रह्म’ या परमात्मा का प्रतीक कहा गया है।

अंक ज्योतिष का आधार :- इसी तरह यदि 108 संख्या को जोड़ा जाए तब 1-0-8=9 परिणाम आता है और यदि 9 के पहाड़े का गुणनफल जोड़ा जाये तो परिणाम 9 ही रहेगा।

इसी प्रकार ब्रह्म न घटता है और न ही बढ़ता है। आद्या शक्ति एवं ब्रह्म- सीता राम, राधा कृष्ण नाम का मूल्यांकन अंक ज्योतिष के नियम से करें तो परिणाम 108 ही आयेगा। सीता व राधा नाम शक्ति स्वरूप है और राम तथा कृष्ण ब्रह्मरुप हैं। सीता राम व राधा कृष्ण का वर्ण क्रम मूल्यांकन निकाला जाये तो परिणाम 108 ही निकलता है-
उपर्युक्त उदाहरण सहित अंक ज्योतिष के नियम अनुसार मंत्र जाप संख्या 108 की पुष्टि करता है। यह मत हमारे मादीपुर कालोनी शिव मंदिर के आचार्य श्री रमेश चंद्र शर्मा, जयपुर (राजस्थान) निवासी ने दिया और कहा कि 108 मणियों की माला को सर्वसिध्दियाक माना गया है।

ज्योतिष का आधार : ज्योतिष विद्या के अनुसार सूर्य जब संपूर्ण 12 राशियों पर एक पूरा चक्र (चक्कर) लगा लेता है तब एक वृत्त पूरा होता है। एक वृत में 360 अंश होते हैं। इस प्रकार की सूर्य की एक प्रदक्षिणा के अंशों की कला बनाएं, तब 360 गुणा 60 – 21,600 कला हुई। यह सर्वविदित है कि सूर्य 6 मास उत्तरायण तथा 6 मास दक्षिणायन रहता है। इस प्रकार 21600 को दो भागों में विभक्त करने से 10800 संख्या प्राप्त होती है।
प्रत्येक दिन सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन तक ‘काल’ का माप 60 घड़ी माना गया है। एक घड़ी में 60 पल और एक पल में 60 विपल होते हैं। इस प्रकार एक अहोरांत (दिन गुणा रात) 60* 60* 60= 21,600 विपल हुए, इसके आधे दिन में 10,800 और इतने ही विपल रात्रि में होते हैं।

हमारे महर्षियों ने हजारों लाखों वर्ष पूर्व आजकल की वैज्ञानिक प्रणाली जैसी दशमलव प्रणाली के सदृश्य काल और संख्या का समन्वय किया था। इसी के अनुसार 10,800 की उपलब्ध संख्या अंक के दो शून्य छोड़ देने पर 108 संख्या प्राप्त होती है। हमारे महर्षियों ने शब्द काल संख्या आदि का पूर्ण रूप से सामंजस्य कर दिया था।
तभी तो 108 मनकों की माला से मंत्र-जप का विधान है। 108 मनकों की माला या 108 जप संख्या आदि शक्ति और ब्रह्मका बोध कराती है।